Tuesday, 31 March 2020

नवधा भक्ति


श्रीमद् भागवतम (7.5.23) के अनुसार, प्रहलाद महाराज ने अपने पितादैत्य-राज हिरन्यकशिपू के पूछने पर सर्वश्रेष्ठ  शिक्षा के रूप में नवधाभक्ति (9 प्रकार की भक्ति) का वर्णन किया:
1.श्रवणं: भगवान के पवित्र नाम को सुनना भक्ति काशुभारम्भ है | श्रीमद् भागवतम के पाठ को सुनना सर्वाधिक महत्वपूर्ण श्रवणविधि है | श्रवण से प्रारम्भ करके भक्ति द्वारा ही मनुष्य पूर्ण पुरुषोत्तमभगवान तक पहुँच सकता है (CC.आदि लीला 7.141)| परीक्षित महाराज ने केवलश्रवण से मोक्ष प्राप्त किया |
2. कीर्तनं: भगवान् के पवित्र नाम का सदैव कीर्तन करना | चैतन्यमहाप्रभु ने संस्तुति की है: कलह तथा कपट के इस युग में उद्धार का एकमात्र साधन भगवान् के नाम का कीर्तन है | कोई अन्य उपाय नहीं है, कोई अन्यउपाय नहीं है, कोई अन्य उपाय नहीं है | निरपराध होकर हरे कृष्ण महामंत्र काकीर्तन करने मात्र से सारे पाप-कर्म दूर होजाते हैं और भगवतप्रेम कीकारणस्वरूपा शुद्ध भक्ति प्रकट होती है (CC.आदि लीला 8.26) | भगवान कापवित्र नाम भगवान के ही समान शक्तिमान है, अतः भगवान के नाम के कीर्तन तथा श्रवण-मात्र से लोग दुर्लघ्य मृत्यु को शीघ्र ही पार कर लेते हैं (SB.4.10.30) | शुकदेव गोस्वामी जी ने केवल कीर्तन से मोक्ष प्राप्त किया |
3. स्मरणं: श्रवण तथा कीर्तन विधियों को नियमित रूप से संपन्नकरने तथा अंत:करण को शुद्ध कर लेने के बाद स्मरण की संस्तुति की गयी है | मनुष्य को स्मरण की सिद्धि तभी मिलती है जब वह निरन्तर भगवान के चरण कमलोंका चिंतन करता है | भक्तियोग का मूल सिद्धांत है भगवान के विषय में निरंतर चिंतन करना, चाहे कोई किसी तरह से भी चिंतन करे | प्रह्लाद महाराज ने भगवान के निरन्तर स्मरण से मोक्ष प्राप्त किया |
4. पाद-सेवनम: भगवान के चरण कमलों के चिंतन में गहन आसक्ति होनेको पाद-सेवनम कहते हैं | वैष्णव, तुलसी, गंगा तथा यमुना की सेवा, पाद-सेवनममें शामिल है | लक्ष्मी जी ने भगवान के चरण कमलों की सेवा कर के सिद्धिप्राप्त की |
5. अर्चनं: अर्चनं अर्थात भगवान के अर्चाविग्रह  की पूजा | अर्चाविग्रह  की पूजा अनिवार्य है | प्रथु महाराज ने भगवान के अर्चाविग्रह  की पूजा कर के मोक्ष प्राप्त किया |
6.वन्दनं: भगवान की वंदना या स्तुति करना | अक्रूरजी ने वंदना के द्वारा मोक्ष प्राप्त किया |
7. दास्यम: दास के रूप में भगवान की सेवा करना | हनुमान जी ने भगवान राम की सेवा कर के मोक्ष प्राप्त किया |
8. साख्यं: मित्र के रूप में भगवान की पूजा करना | सखा शब्दप्रगाढ़ प्रेम का सूचक है | अर्जुन ने भगवान से मैत्री स्थापित कर के मोक्षप्राप्त किया तथा
9.आत्मनिवेदनम: जब भक्त अपना सर्वस्व भगवान को अर्पित करदेता है और हर कार्य भगवान को प्रसन्न करने के लिए करता है, यह अवस्था आत्मनिवेदनम है | आत्मनिवेदनम का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण बलि महाराज तथा अम्बरीष महाराज का है | आत्मसमर्पण करने के फलस्वरूप भगवान बलि महाराज के द्वारपाल बन गये तथा उन्होंने सुदर्शन चक्र को अम्बरीष महाराज की सेवा मेंनियुक्त कर दिया |
भक्ति सम्पन्न करने की नौ संस्तुत विधियाँ सर्वश्रेष्ठ हैं, क्योंकिइन विधियों में कृष्ण तथा उनके प्रति प्रेम प्रदान करने की महान शक्तिनिहित है (CC.अन्त्य लीला 4.70) | भक्ति का फल जीवन का चरम लक्ष्य भगवत्प्रेम है (CC.मध्य लीला 23.3) | श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा है:जबमनुष्य श्रवण, कीर्तन से आरम्भ होने वाली इन नौ विधियों से कृष्ण कीप्रेममयी सेवा करता है, तब उसे सिद्धि का पाँचवां पद एवं जीवन के लक्ष्य कीसीमा भगवत्प्रेम की प्राप्ति होती है (CC.मध्य लीला 9.261) | जब कोईव्यक्ति भक्ति में स्थिर हो जाता है, तो चाहे एक विधि को सम्पन्न करे याअनेक विधियों को, उसमे भगवत्प्रेम जागृत हो जाता है (CC.मध्य लीला 22.134) | वह भी श्री कृष्ण को प्रसन्न कर सकता है, जिस प्रकार उपरोक्त ने किया है |
श्रीमद् भागवतम (4.8.59-61) मेंनारद मुनि ध्रुव को समझाते हैं: “जो कोई गम्भीरता तथा निष्ठा से अपने मन,वचन तथा शरीर से भगवान की भक्तिकरता है और जो बताई गई भक्ति-विधियों के कार्यों में मग्न रहता है, उसे उसकी इच्छानुसार भगवान वर देते हैं | यदि भक्त धर्म,अर्थ, काम या भौतिकसंसार से मोक्ष चाहता है, तो भगवान इन सभी फलों को प्रदान करते हैं | लेकिनयदि कोई मुक्ति के लिए अत्यंत उत्सुक हो तो उसे दिव्य प्रेमाभक्ति कीपद्धति का द्रढ़ता से पालन कर समाधी की सर्वोच्च अवस्था में रहना चाहिए और इन्द्रिय-तृप्ति के समस्त कार्यों से पूर्णतया विरक्त रहना चाहिए” |
भक्ति में विशेष प्रगति करने के लिए श्रवण तथा कीर्तन विधियों को संपन्नकरते समय हमें भगवान का स्मरण (भगवान के सर्वआकर्षक रूप का ध्यान) अवश्यकरना चाहिए | श्रवण, कीर्तन, स्मरण इत्यादि आध्यात्मिक कार्यकलाप भक्तिके स्वाभाविक लक्षण है | इसका तटस्थ लक्षण यह है कि इससे कृष्ण के प्रतिशुद्ध प्रेम उत्पन्न होता है (CC.मध्य लीला 22.106) | यमराज कहते हैं कि भगवान के नाम के कीर्तन से प्रारंभ होने वाली भक्ति ही इस भौतिक जगत में जीव के लिए परम धार्मिक सिद्धांत है (SB.6.3.22) | अतः जो व्यक्ति भवबंधन से मुक्त होना चाहता है, उसे चाहिए कि भगवान केनाम, यश, रूप, तथा लीलाओ के कीर्तन तथा गुणगान की विधि को अपनाए (SB.6.2.46) | हे नरहरी,जिन जीवों ने यह मनुष्य जीवन प्राप्त किया है यदि वे आपका श्रवण,कीर्तन,स्मरण तथा अन्य भक्ति कार्य करके आपकी पूजा करने से चूक जाते हैं तो वहव्यर्थ ही जीवित हैं और धोंकनी के समान ही स्वांस लेते रहते हैं (श्रीलश्रीधर स्वामी ) |
जिस व्यक्ति ने कभी भी भगवान के शुद्ध भक्त की चरण-धूलि अपने मस्तक परधारण नही की, वह निश्चित रूप से शव है तथा जिस व्यक्ति ने भगवान केचरण-कमलो पर चढे तुलसी-दलों की सुगन्धि का अनुभव नही किया,वह स्वांस लेतेहुए भी मृत देह के तुल्य है (SB.2.3.23) | चाहे निष्काम हो, चाहेसमस्त कामनाओं से युक्त हो, अथवा मोक्ष चाहता हो, बुद्धिमान व्यक्ति कोचाहिए कि भक्ति योग के द्वारा भगवान श्री कृष्ण की आराधना करे | वैदिकग्रंथों में कृष्ण आकर्षण के केन्द्रबिन्दु हैं और उनकी सेवा करना हमाराकर्म है | हमारे जीवन का चरम लक्ष्य कृष्ण-प्रेम प्राप्त करना है | अतएवकृष्ण, कृष्ण की सेवा तथा कृष्ण-प्रेम; ये जीवन के तीन महाधन हैं (CC.मध्यलीला 20.143) | भक्ति का अर्थ है समस्त इन्द्रियों के स्वामी, पूर्णपुरुषोत्तम भगवान की सेवा में अपनी सारी इन्द्रियों को लगाना | भगवान कीसेवा में लगे रहने मात्र से व्यक्ति की इन्द्रियाँ शुद्ध हो जाती हैं (CC.मध्य लीला 19.170) | इन्द्रियों के द्वारा इन्द्रियों के स्वामी कीसेवा करना ही भक्ति है | अपनी खुद की इन्द्रियों की तृप्ति करने की इच्छा कामहै, किन्तु कृष्ण की इन्द्रियों को तुष्ट करने की इच्छा प्रेमहै (CC.आदि लीला 4.165) |
जब बच्चा जन्म लेता है, तो कुछ दिनों में ही अपनी माँ को प्रेम करनेलगता है, फिर अपने पिता को | धीरे धीरे वह अपने अन्य भाई,बहन को प्रेम करनेलगता है | क्या उसे कोई यह प्रेम करना सिखाता है? नहीं | भगवान प्रत्येकजीव को प्रेम करने की शक्ति अर्थात भक्ति देकर ही इस जगत में भेजतें हैं | लेकिन हम इस शक्ति को शरीर के रिश्तेदारों व संसारिक वस्तुओं में निवेशितकरते रहते हैं जबकि इसे हमें भगवान की सेवा या भक्ति में नियोजित करना होताहै | तभी हम भगवत-प्रेम का विकास अपने हृदय में कर सकते हैं | वस्तुतःभगवान के साथ हमारा सम्बन्ध सेवा का सम्बन्ध है | भगवान परम भोक्ता हैं औरहम सारे जीव उनके भोग(सेवा) के लिए बने हैं और यदि हम भगवान के साथ उसनित्य भोग में भाग लेते हैं तो हम वास्तव में सुखी बनते है तथ आनन्द काउपभोग करते हैं, क्योंकि भगवान आनन्द के आगार हैं | हम किसी अन्य प्रकार सेया स्वंतत्र रूप से कभी भी सुखी नही बन सकते |
श्रीमद् भागवतम (4.22.22-23) में सनत्कुमार राजा पृथू को समझाते हुए कहते हैं: “भक्ति करने,भगवान के प्रति जिज्ञासा करने, जीवन में श्रद्धा पूर्वकभक्तियोग का पालन करने, भगवान की पूजा करने तथा भगवान की महिमा का श्रवण वकीर्तन करने से परमेश्वर के प्रति आसक्ति बड़ाई जा सकती है | मनुष्य को अपनाजीवन इस प्रकार ढालना चाहिए कि उसे भगवान हरि की महिमा का अमृत पान कियेबिना चैन न मिले” | तथाशुकदेव गोस्वामी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं” “भगवान कृष्ण के चरण-कमलों की स्मृति प्रत्येक अशुभ वस्तु को नष्ट करती हैऔर परम सौभाग्य प्रदान  करती है | यह हृदय को परिशुद्ध करती है तथा भक्तिके साथ साथ त्याग से युक्त ज्ञान प्रदान करती है” (SB.12.12.55) |
प्रह्लाद महाराज भगवान नृसिंह की प्रार्थना करते हुए भक्ति की श्रेष्ठता का वर्णन करते हुए कहते हैं:  “भले ही मनुष्य के पास सम्पत्ति, राजसी परिवार, सौन्दर्य, तपस्या, शिक्षा, दक्षता, कान्ति, शारीरिक शक्ति, बुद्धि तथा योगशक्ति क्यों न हों, किन्तु इन सारी योग्यताओं से भी कोई व्यक्ति भगवान को प्रसन्न नही कर सकता | केवल भक्ति से वह ऐसा कर सकता है (SB.7.9.9) | न तो भौतिक प्रकृति के तीनगुण, न इन तीन गुणों के नियामक अधिष्ठाता देव, न पांच स्थूल तत्व, न देवता, न मनुष्य ही आपको समझ सकते हैं क्योंकि ये सभी जन्म- मृत्यु के वशीभूतरहते हैं ऐसा विचार करके बुद्धिमान व्यक्ति वैदिक अध्ययन की परवाह नहीकरते, अपितु वे आपकी भक्ति में अपने आप को लगाते हैं |
भक्ति-कर्म दो प्रकार का है; राग भक्ति (स्वतः स्फूर्त) तथा विधि भक्ति (साधन भक्ति) | रागानुगा भक्ति से मनुष्य को मूल भगवान अर्थात कृष्ण की प्राप्ति होतीहै और विधि-विधानों से भक्ति करने पर मनुष्य को भगवान का विस्तार रूपप्राप्त होता है | माता यशोदा के पुत्र भगवान कृष्ण रागानुगा  प्रेमा-भक्तिमें लगे भक्तों के लिए उपलब्ध हैं | वैधि भक्ति करने से मनुष्य नारायण का पार्षद बनता हैं (CC.मध्य लीला 24.84-87) |
श्रीमद् भागवतम (6.9.48) में भगवान कहते हैं: “यह सत्य है कि मेरे प्रसन्न हो जाने पर किसी के लिए कुछ भी प्राप्त कर लेना कठिन नही है, तो भीशुद्ध भक्त जिसका मन अनन्य भाव से मुझ पर स्थिर है, वह मेरी भक्ति में निरत रहने के अवसर के अतिरिक्त मुझ से और कुछ नही मांगता| भक्ति इतनीप्रबल है कि जब कोई इसमें लग जाता है, तो वह क्रमशः समस्त भौतिक इच्छाओं कापरित्याग कर देता है और पूरी तरह से कृष्ण के चरण-कमलों के प्रति अनुरुक्तहो जाता है यह सब भगवान के दिव्य गुणों के प्रति आकर्षण से ही सम्भव होपाता है (CC.मध्य लीला 24.198) | भगवान वासुदेव में अविचल भक्ति रखने वालेव्यक्ति के चरित्र में समस्त सद्गुण स्वतः आ जाते हैं (SB.5.18.12) | यदि किसी में कृष्ण के प्रति अविचल भक्तिमयी श्रद्धा है, तो उसमें सारेदेवताओं के सद्गुण धीरे-धीरे प्रकट हो जाते हैं (CC.आदि लीला 8.58) | श्रीसूत गोस्वामी ने जन साधारण के परम कल्याण के विषय पर ऋषियों के पूंछने परबताया कि सम्पूर्ण मानवता के लिए परमवृति (धर्म) वही है, जिसके द्वारासारे मनुष्य भगवान की प्रेम-भक्ति प्राप्त कर सके | ऐसी भक्ति अकारण तथाअखंड होनी चाहिये जिससे आत्मा पूर्ण रूप से तुष्ट हो सके | भगवान श्री कृष्ण की भक्ति करने से मनुष्य तुरन्त ही अहैतुक ज्ञान तथा संसार से वैराग्य प्राप्त कर लेता है(SB.1.2.6-7) | श्रीमद् भागवतम (4.24.59) में शिवजी कहते हैं:जिसका ह्रदय भक्तियोग से पूर्ण रूप से पवित्र हो चुका हो तथा जिस पर भक्ति देवीकी कृपा हो, ऐसा भक्त कभी भी अंधकूप सद्रश्य माया द्वारा मोहग्रस्त नहीं होता |
श्रीमद् भागवतम (12.3.45-46) में शुकदेव गोस्वामी कलियुग के लक्षण बताने के बाद महाराज परीक्षित को बताते हैं किकलियुग में वस्तुएँ, स्थान तथा व्यक्ति भी सभी प्रदूषित हो जाते हैं | किन्तु यदि कोई व्यक्ति हृदय के भीतर स्थित परमेश्वर के विषय में सुनता है, उनकीमहिमा का गान करता है, उनका ध्यान करता है उनकी पूजा करता है तो भगवान उसव्यक्ति के मन से हजारों जन्मों से संचित कल्मष को दूर कर देते हैं | तथा श्रीमद् भागवतम के स्कन्द 10 को शुकदेव गोस्वामी इस श्लोक से समाप्त करते हैं:नित्यप्रति अधिकाधिक निष्ठापूर्वक भगवान मुकुन्द की सुन्दर कथाओं के नियमित श्रवण, कीर्तन तथा ध्यान से मर्त्य प्राणी को भगवान का दैवीधाम प्राप्त होगा जहाँमृत्यु की दुस्तर शक्ति का शासन नहीं है (SB.10.90.50) |
यह भक्ति ज्ञान आपके और मेरे हृदय में प्रकट हो इसी शुभकामना के साथ,

CC- Chaitanya Charitamrit
SB- Shrimad Bhagwatam

हरे कृष्ण
दण्डवत
अवधेश पराशर 


Monday, 30 March 2020

कष्टों से छुटकारा कैसे ?

हरे कृष्ण,
यह मनुष्य का शरीर अनेकों जन्मों के बाद प्राप्त होता है कहा जाता है ८४ लाख योनिओं मैं भटकने के बाद प्राप्त होता है जिसमें ९ लाख प्रकार के जलचर अर्थात जलीय जीव जंतु, १० लाख प्रकार के पक्षी ११ लाख प्रकार के कृमि कीट, २० लाख प्रकार की वनस्पतियाँ अर्थात पैर पौधे, ३० लाख प्रकार के पशु और ४ लाख प्रकार के मनुष्य होते हैं । अब प्रश्न ये है की ४ लाख मैं हमारी स्थिति क्या हैं‍? यदि हमें थोडा ज्ञान प्राप्त है और अध्यात्मवादी हैं तो हम ऊपर के १००० के अंतर्गत आते हैं।
प्रश्न है की हमें दुःख क्यों प्राप्त होते है और उनसे छुटकारा पाने का उपाय क्या है ? कष्ट सामान्यतया ३ प्रकार के होते हैं।
  1. अध्यात्मिक कष्ट - जो हमारे मन और शरीर द्वारा प्राप्त जैसे बीमारी और शोक, कभी कभी कोई अशुभ सूचना प्राप्त नहीं होने पर भी हमारा मन दुखी रहता है आमतौर पर कहते हैं मूड ऑफ है ये वास्तव मैं अध्यात्मिक क्लेश है।
  2. आधिभौतिक कष्ट - दूसरे जीवों द्वारा द्वारा प्राप्त कष्ट जैसे मच्छर के काटने से मलेरिया या कोरोना की बीमारी या गुंडों द्वारा सताया जाना इत्यादि इनको आधिभौतिक क्लेश कहा जाता है।
  3. आधिदैविक कष्ट - प्राकृतिक आपदाओं द्वारा प्राप्त कष्ट जैसे सुनामी, भूकंप, सूखा, बाढ़ इत्यादि इनको आदिदैविक क्लेश कहा जाता है।
अब प्रश्न है की इन कष्टों से छुटकारा कैसे प्राप्त करें ?
भगवद गीता मैं चार प्रकार के दुःख बताये गए हैं - जन्म, मृत्यु, जरा(बुढ़ापा), व्याधि(बीमारी). हमारे जन्म लेते ही ये दुःख शुरू हो जाते हैं यदि जन्म लेते हैं तो मरेंगे अवश्य और बीमार भी होंगे एवं बुढ़ापा भी जरूर  आएगा तो आसान सा उपाय है की यदि हमारा अगला जन्म ही न हो तो इन चरों दुखों से हम बच जायेगे। लेकिन हम क्या करें जो हमारा जन्म न हो? दुखों का असली कारण हमारा प्रारब्ध है अर्थात विगत कर्म या पूर्व मैं किये गए कर्म। अब हम विगत कर्मों को तो बदल नहीं सकते लेकिन उनको शून्य अवश्य कर सकते हैं। यदि हम अपने कर्मफलों को शून्य कर दें तो सुख और दुःख से दूर हो जायेंगे और पुनर्जन्म भी प्राप्त नहीं होगा इसी को विद्वान लोग मोक्ष प्राप्ति कहते हैं ।

सरल उपाय

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे  ।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।।
इस १६ नाम वाले महामंत्र का नियमित जाप करने से हम इन त्रिताप से बच सकते हैं और जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधि से भी छुटकारा पा सकते हैं ।
  
भगवत गीता मैं भगवान् कहते हैं

अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम।

अर्थात अंत समय मैं मनुष्य की आसक्ति जिसमें होती है वह उसी प्रकार के शरीर को प्राप्त होता है यदि हमने अपने जीवन मैं भगवान् की भक्ति की होगी तब ही अंत समय मैं हम भगवान् का स्मरण कर सकते हैं और भगवान् को प्राप्त कर सकते हैं।  जैसे गांधीजी ने मरते समय हे राम कहा था क्योंकि वो जानते थे कि मरते समय क्या बोलना है और उन्होंने इसका अभ्यास भी क्या था उन्होंने भगवत गीता पर टीका भी लिखी थी जो मोदी ने ओबामा को भेंट मैं दी थी।

लेख अधिक बड़ा न हो जाए इसलिए मैं इतना ही कहना चाहता हूँ की हरे कृष्ण महामंत्र का नियमित जप और  कीर्तन करें और कष्टों से छुटकारा पाएं।
हरे कृष्ण।

Sunday, 29 March 2020

कोरोना का कहर कब तक ?

सामान्यतया भगवान् के भक्त प्रकृतिक आपदाओं को ३  प्रकार के कष्टों  मैं गिनती करते हैं 
१. आदिदैविक कष्ट
२. आदिभौतिक कष्ट
३. आध्यात्मिक कष्ट 

कोरोना ये भौतिक कष्ट के अंतर्गत आता है. सामान्यतया हरिनाम का जाप करने से ये कष्ट या दुःख आम लोगों के नहीं सताते. लेकिन हमारे मन मैं अक्सर ये प्रश्न घुमते रहते हैं कि ये सब कब तक चलेगा ?

आजकल क्योंकि अवकाश चल रहा है तो नियमित से अधिक जप, श्रवण और स्वाध्याय से जो समय बचा तो सोचा चलो ज्योतिष बिज्ञान का भी कुछ अध्ययन कर लिया जाए. इसमें जैसा मेरी समझ मैं आया वो आपकी सेवा मैं प्रस्तुत है-
१. शनि ने मकर राशी मैं प्रवेश किया २४ जनवरी को जो उसका स्वग्रह है लगभग तब से ही कोरोना का प्रभाव दिखना शुरू हुआ और ये बढ़ता जा रहा है.
२. २२ मार्च को मंगल भी उसी स्थान पर शनि के साथ आ गया तो शनि और मंगल कि युति बन गई 
क्योंकि ये दोनों ही क्रूर गृह हैं तो तांडव दिखाना शुरू कर दिया. मंगल लगभग ४३ दिनों तक इसी स्थान पर  रहेगा.
३. ३० मार्च को गुरु उसी स्थान पर अर्थात मकर राशी मैं प्रवेश करेगा जो दोनों को शांत करेगा 
तो हम आशा कर सकते हैं कि ३० मार्च के बाद झुलसती गर्मी मैं जैसे ठंडी हवा का झोंका शरीर को शीतलता प्रदान करता है वैसे ही वृहस्पति  आमजन को थोड़ी राहत प्रदान करेंगे और ये ५ मई तक इसी स्थान पर रहेंगे . 
४.  धीरे धीरे आगे चलकर कुछ समय बाद क्योंकि मंगल भी अपनी राशी बदल देगा तो ग्रहों का प्रकोप समय के साथ कम होता ही रहेगा.
५. हम आशा कर सकते हैं कि ३० मार्च के बाद राहत महसूस होगी और कोरोना का प्रकोप छंट जाएगा.

 

Thursday, 12 March 2020

आचमन कैसे करें ?

आचमन कैसे करें-
भारतीय समाज मैं कोई भी पूजा या अर्चना करने पहले आचमन अवश्य करना चाहिए.आचमन करने के लिए ताम्बे का पात्र और चम्मच का प्रयोग करते हैं
दाहिने हाथ के अंगूठे से उसके पास वाली उंगली को दबाकर शेष तीन उंगली को खुली छोड़ दें.
अब बांएँ हाथ मैं चम्मच लेकर दाहिने हाथ के बीच मैं चम्मच से जल डालें और मंत्र बोलें
ॐ केशवाय नामः अब जल पी लें  फिर से जल लें और
ॐ नारायणाय नमः अब जल पी  लें फिर से जल लें और
ॐ माधवाय  नमः अब जल पी लें  इस प्रकार तीन  बार करना चाहिए.

ॐ गोविन्दाय नमः बोलकर चौथी बार मैं हाथ धो लें


भगवान् की आरती

यदि आप अपने आप को हिन्दू मानते हो आपको भगवान्  की आरती करनी चाहिए

हिन्दू धर्म मैं मनुष्य का सर्वोच्च लक्ष्य भगवान् को प्राप्त करना है. भगवान् को प्राप्त करने के २ रास्ते हैं. पहला भागवत  पद्धति जिसमें श्रवण और कीर्तन मुख्य है और दूसरा पञ्चरात्र पद्धति जिसमें अर्चा विग्रह सेवा हैं और पांच बार आरती होती हैं. 

भागवत पद्धति मैं सिर्फ श्रवण और कीर्तन है मंदिर नहीं है. भारत बर्ष मैं कई भक्त हुए हैं जिन्होंने इस पद्धति को अपना कर भगवान् को प्राप्त किया है जैसे परीक्षित महाराज मुख्य हैं. उन्होंने सिर्फ भागवत कथा सुनकर भगवान् को प्राप्त किया.

दूसरा तरीका है भगवान् की सेवा करके भगवान् को प्राप्त करने का. वैष्णव संप्रदाय  मैं  मूर्ती पूजा नहीं कहा जाता बल्कि अर्चा विग्रह सेवा कहा जाता है. क्योंकि हमारे घर या मंदिर मैं जो भगवान् होते हैं वो मूर्ति नहीं होती बल्कि ऐसा विग्रह होता है जो सेवा लेने के लिए उपस्थित हैं. भक्ति का अर्थ होता है भगवान् की प्रेमपूर्वक सेवा.

अर्चा विग्रह सेवा का लाभ- 
अर्चा विग्रह सेवा करने से मनुष्य मात्र मैं सेवा करने का भाव उत्पन्न होता है और उसके जीवन मैं अनुशासन आता है. क्योंकि यदि घर मैं भगवान् हैं तो समय पर उनकी सेवा करनी आवश्यक है अन्यथा उनको हटा दो . घर हो या मंदिर भगवान् की सेवा समय पर और अनुशासित तरीके से करना अनिवार्य है. यदि आप भगवान् की सेवा अनुशासित तरीके से करते हैं तो आपके जीवन मैं अनुशासन आना निश्चित है.  यदि आपके जीवन मैं अनुशासन है तो आपका जीवन व्यवस्थित होगा और आपकी तरक्की भी होना निश्चित हैं.

हम दोनों विधियों का सही प्रकार से प्रयोग करना सीखेंगे. हम दोनों को मिक्स करके विधि पूर्वक भक्ति कैसे करें इसके बारे मैं चर्चा करेंगे और आपके प्रश्न भी आमंत्रित हैं यदि आपके मन मैं कोई जिज्ञासा उत्पन्न हो रही हो तो आपके प्रश्नों का स्वागत है.
१. सुबह जल्दी उठना
सबसे आवश्यक बात हैं सुबह जल्दी उठना चाहिए. वैसे तो ब्रह्म मुहूर्त मैं उठने का विधान है ब्रह्म मुहूर्त का मतलब है सूर्योदय से  ९६ मिनट अर्थात लगभग १.३० घंटे पहले का समय ब्रह्म मुहूर्त कहलाता हैं. ये सतोगुण का समय होता है. मन मैं गंदे विचार नहीं आते और मन शुद्ध रहता है. पूरा ब्रह्माण्ड सत्व गुण से युक्त हो जाता हैं.  
२. दैनिक क्रियाओं से निवृत्त होने के बाद सर्व प्रथम भगवान् को जगाना चाहिए और यदि संभव हो तो भगवान् को दूध का भोग लगायें. (भोग कैसे लगाएं इसकी चर्चा बाद मैं करेंगे) दूध का भोग लगाने के बाद मंगला आरती करें. मंगला आरती करने से व्यक्ति का जीवन मैं कभी भी अमंगल नहीं होता हैं. 
३. दैनिक जप मंगला आरती करने के बाद भक्त को दैनिक जप निर्धारित मात्रा मैं जप करना चाहिए. आप साधारणतया हरे कृष्ण महामंत्र का जप कर सकते हैं (जप विधि की चर्चा हम अलग से करेंगे). 
४ श्रृंगार आरती - जप करने के बाद आप भगवान् का श्रृंगार करें और छोटी सी  श्रृंगार आरती अवश्य करें. 
५. भोग - घर मैं जो भी आहार आप ग्रहण करते हैं उसका भोग भगवान् को अवश्य लगाएं आप चाहे जितने बार भगवान् को भोग लगा सकते हैं. 
६. यदि पति पत्नी घर पर नहीं रहते नौकरी करते हैं तो भगवान के मंदिर का पर्दा लगाकर ही बाहर जाएं. 
यदि पत्नी घर पर ही रहती है तो दोपहर को १२.२० बजे भगवान् को भोग लगाकर भोग आरती करके फिर पर्दा लगाएं.भगवान् को विश्राम कराएं.
७. शाम को ४ बजे भगवान् का पर्दा खोलें और भगवान् को हल्का फुल्का नाश्ता या पेय पदार्थ का भोग लगाएं.
८.  शाम को सूर्यास्त होने के तुरंत बाद संध्या आरती करनी चाहिए. 
९. रात्रि में भोग लगभग ८.३० बजे लगाने के बाद शयन आरती करें और भगवान् को शयन कराएं. पर्दा लगा दें. 
१०. भगवान् का पर्दा लगाते और हटाते समय घंटी जरूर बजाएं.
११. रात मैं १० बजे सभी को सो जाना चाहिए. यदि आप अपने व्यापार या नौकरी के कारण देर से घर लौटते हैं तो सुविधानुसार फेर बदल कर सकते हैं लेकिन जीवन मैं आपके लिए क्या महत्त्वपूर्ण है भगवान् या व्यापार ये प्राथमिकता आपको ही तय करनी होगी.  जो आपकी प्राथमिकता होगी वो ही आपको प्राप्त होगा. आप जो समय निश्चित करें आपको उस समय का कड़ाई  से पालन करना होगा अन्यथा अपने घर मैं भगवान् के विग्रह न रखें क्योंकि यदि आप नियमों का पालन नहीं करते तो अपराध होगा और अपराध की क्षमा नहीं होती.

इतना सब करने के पीछे उद्देश्य है की भगवान् का स्मरण बना रहे और जिसके साथ हम जितना अधिक समय बिताते हैं उस से उतना गाढ़ा प्रेम उत्पन्न होता है और फालतू के कामों से हम बचे रहते हैं. दरअसल ये एक बिज्ञान हैं. एक बार हमें भगवान् से प्रेम उत्पन्न हो जाएं फिर हम संसार मैं सभी जीवों से प्रेम कर सकते हैं. भक्ति का अर्थ है भगवान् की प्रेम पूर्वक सेवा.



आध्यात्मिक जगत

आइये दोस्तों आज हम अध्यात्मिक जगत को जानने का प्रयास करते हैं की वह कहाँ है ?
सबसे पहले आप निम्न लेख को पढ़ें https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%8F%E0%A4%82%E0%A4%9F%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%9F%E0%A4%B0

अब हम इसको समझने का प्रयास करते हैं
उपरोक्त लेख मैं निम्नलिखित प्रस्ताव प्रस्तुत किये गए हैं.
१. एक प्रतिपदार्थ अणु या कण होता है जो की पदार्थमय (भौतिक अथवा मटेरियल) अणुओं के गुणों से निर्मित हैं.
२. इस पदार्थमय संसार के अतिरिक्त एक और संसार है जिसका केवल सीमित अनुभव है.
३. प्रतिपदार्थमय संसार और पदार्थमय संसार किसी निश्चित समय मैं  एक दूसरे से टकरा सकते हैं और एक दूसरे को विनष्ट कर सकते हैं.

उपरोक्त तीनों मैं से हम आस्तिक विज्ञानं के विद्यार्थी १ और २ से पूर्णतः सहमत हैं किन्तु तीसरे प्रस्ताव का समर्थन हम केवल बैज्ञानिक परिभाषा के अंतर्गत ही कर सकते हैं. कठिनाई इस बात मैं है प्रतिपदार्थ से सम्बंधित वैज्ञानिकों द्रष्टिकोण मात्र भौतिक ऊर्जा के एक प्रकार एक अन्य प्रकार तक ही विस्तृत है जबकि वास्तविक प्रतिपदार्थ पूर्णतः अभौतिक होना चाहिए | पदार्थ अपनी बनावट मैं विनाशगत, किन्तु प्रतिपदार्थ यदि वास्तव मैं वह समस्त भौतिक गुणों से मुक्त है तो विनाश से मुक्त होना चाहिए.
यदि पदार्थ विभाजित होने लायक है तो प्रतिपदार्थ अविनाशी और अटूट होना चाहिए |

समस्त विश्व मैं सर्वाधिक मान्य शास्त्र वेद हैं. वेद ४ हैं हम सब जानते हैं. सामान्य बुद्धि वाले व्यक्ति के लिए वेदों का विषय बहुत कठिन हैं. व्याख्या की द्रष्टि वेदों का स्पष्टीकरण महाकाव्य महाभारत तथा पुराणों मैं दिया गया है. रामायण भी एक महाकाव्य है जिसमें वेदों की समस्त आवश्यक जानकारी समाविष्ट हैं | उपनिषद चारों वेदों के ही भाग हैं. और वेदांत सूत्र वेदों का नवनीत हैं. समस्त वैदिक साहित्य के संक्षिप्तीकरण हेतु भगवद गीता को समस्त उपनिषदों का सार एवं वेदांत सूत्र की प्राथमिक व्याख्या के रूप मैं स्वीकार किया जाता है. अत: केवल भगवद गीता के द्वारा ही समस्त समस्त वेदों का सार प्राप्त किया जा सकता है |

भगवद गीता मैं भगवत की उत्कृष्ट शक्ति को परा शक्ति कहा गया है. बैज्ञानिकों ने खोज की है की नाशवान पदार्थ दो प्रकार के होते हैं, किन्तु गीता पूर्ण रूप से पदार्थ व प्रतिपदार्थ की संकल्पना, शक्ति के दो रूपों मैं वर्णित करती है. पदार्थ एक शक्ति है जो पदार्थमय संसार बनती है और वही शक्ति अपने उच्चतर रूप मैं प्रतिपदार्थमय (दिव्य) जगत का भी निर्माण करती है.